संपादक का सन्देश

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सर्वप्रथम, हम पर विश्वास जताते हुए वंडरपब्लिश की इस यात्रा का हिस्सा बनने के लिए आप सभी को बधाई।

यात्रा के इस प्रथम पड़ाव पर मैं आप सभी का स्वागत करता हूँ। और जैसा कि हमेशा से यह परंपरा रही है कि हर कार्य की शुरुआत में उसके उद्देश्यों को जान लेना आवश्यक है, ठीक उस ही प्रकार इस पहले सन्देश के माध्यम से मैं आप सभी को वंडरपब्लिश के बारे में बताते हुए, कुछ मूलभूत प्रश्नों का उत्तर देने जा रहा हूँ।

सर्वप्रथम व्यापक प्रश्न, ये सब आखिर किस लिए?

जैसा की आप सभी ने सुना होगा कि आवश्यकता, आविष्कार की जननी है। ठीक इस ही लकीर पर चलते हुए, प्रकाशन जगत की नवीनतम तकनीकों एवं समाजोपयोगी जानकारी से लोक जन को अवगत कराने एवं उन्हें उज्जवल भविष्य की नींव रखने हेतु सक्षम बनाने के लिए यह कदम उठाया गया है।

वंडरपब्लिश ही क्यूँ?

लगभग 5 वर्षों से प्रकाशन जगत की विभिन्न आवश्यकताओं को अपने तकनीकी विभाग, वंडरस्लेट के माध्यम से समझने और पूरा करने के बाद हमने यह निर्णय लिया कि अब उस समाज के प्रति ज़िम्मेदारी निभाई जाए, जिसने हमें यहाँ तक पहुँचाया है। ‘ज्ञानार्थ प्रवेश, सेवार्थ प्रस्थान’ के सेवा भाव को आगे बढ़ाते हुए हम वंडरपब्लिश के माध्यम से अब उन सभी लोगों तक पहुंचने के लिए प्रयासरत हैं जो शिक्षा के क्षेत्र में किसी भी रूप में जुड़े हैं।

इस कदम का सामरिक एवं समकालीन महत्त्व?

प्रकाशन एक प्राचीन विधा है, जिसने समय के अनुसार बहुत स्वरुप बदले हैं। 21वीं सदी में इंटरनेट ने इसके मुख्य प्रारूप को बहुआयामी बनाया है। आने वाला दशक कौनसी करवट लेगा, यह पाठकों के बदलते रवैये एवं तकनीकी सुधारों पर निर्भर करेगा। आप चाहें पाठक हों या प्रकाशक, या बीच की एक कड़ी, आने वाले समय में इन तकनीकी सुधारों एवं समस्याओं के प्रति सजगता ही आपकी सफलता की सीढ़ी साबित होगी। इस सजगता के प्रसार के लिए ही उठाया गया है यह कदम, वंडरपब्लिश। चूँकि सही समय पर उठाया गया कदम, देर से किये गए किसी भी तरह के प्रयास से ज़्यादा सफलता प्रदान करता है, वंडरपब्लिश को अस्तित्व में लाने के लिए इस से अच्छा समय नहीं हो सकता।

आशा है, आपकी भागीदारी बनी रहेगी।

शेष, अगले अंक में।

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